Wednesday, 10 October 2018

21वीं शताब्दी में प्राचीन अदभुत विज्ञान की प्रासंगिकता !
जब से दीनानाथ बत्रा और बाबा रामदेव विश्व स्तर पर, प्राचीन भारतीय विज्ञान के ब्रेंड़ एम्बेस्ड़र बने हैं -पूरे विश्व में भारतीय विज्ञान की गौरवशाली परम्पराओं और ठोस असाधारण उपलब्धियों की चर्चा दसों दिशाओं में गूंज रही है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (world health organisation )ने इस चर्चा का संज्ञान लेते हुए ,डा. रिचर्ड़सन के नेतृत्व में पांच शीर्षस्थ वैज्ञानिकों का प्रतिनिधि मंडल भारत भेजा है जो 111 दिनों में निम्न विषयों का गहन अध्ययन करेगा :-
# कलश (घड़े) से महाॠषि अगस्त्य और वसिष्ठ का जन्म. (संदर्भ ऋग्वेद 7/33/11-13).
# कार्तिकेय का गंगा नदी से जन्म, (संदर्भ वाल रामायण 1/37/12,14-15,17-18,21-23).
# राजा सगर की पत्नी सुमति द्वारा 60,000 पुत्रों का जन्म. (संदर्भ वाल्मीकि रामायण 1/38/17-18).
# मनु की नाक से बच्चे का जन्म.(संदर्भ विष्णु पुराण 4/2/11).
# गोद में गिरे वीर्य से असंख्य ब्रह्मचारियों का जन्म. (संदर्भ, शिवपुराण, ज्ञानसंहिता 18).
# गिरे वीर्य से हज़ार वर्ष बाद बच्चे का जन्म. (संदर्भ, ब्रह्मावैवर्तपुराण, ब्रह्मखण्ड, 4/23-24).
# लकड़ी से पुत्र का जन्म. (संदर्भ, देवीभागवतपुराण, 1/14/4-8).
# दोने से द्रोणाचार्य का जन्म. (संदर्भ, महाभारत, आदिपर्व, 129/33-38).
# सरकंड़े से कृपाचार्य का जन्म. (संदर्भ, महाभारत, आदिपर्व 129/6-20).
# पुरुष की कोख से पुत्र का जन्म. (संदर्भ, भागवतपुराण, 9/6/26-31).
# जंघाओं और भुजाओं से बच्चों का जन्म. (संदर्भ, भागवतपुराण, 4/14/43-45,4/15/1-5).
# गौमाता से मानव शिशु का जन्म. (संदर्भ, पद्मपुराण, उत्तराखंड, 4/62-65).
# मांस के लोथड़े से 101बच्चों का जन्म. (महाभारत, आदिपर्व, 114/9-13,18-22,40-41).
# अग्नि से दो बच्चों का जन्म. (संदर्भ, महाभारत, आदिपर्व, 166/39,44).
# मछली के पेट से मानव का जन्म. (संदर्भ, महाभारत, 63/64,49-50,59-61,67-68).
# खीर से गर्भवती होकर दशरथ की पत्नियों द्वारा चार पुत्रों का जन्म. (संदर्भ, वाल्मीकि रामायण, बालकांड़, 16/11/15-20,30).
* विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि गहन अध्ययन के बाद पांच में से चार वैज्ञानिक मानसिक सन्तुलन खो बैठे हैं और वह आगरा के मेंटल हास्पिटल में चिकित्सा लाभ प्राप्त कर रहे हैं.
व्यंग्य यथार्थ के आसपास। 🤣😂🤣😃
मुझे लगा जैसे मेरा मन मस्तिष्क शून्य हो गया हो, सोच समझ कर फेस बुक पर कुछ कहने की अभिव्यक्ति पर जैसे अंकुश लग गया हो। फेसबुक पर नियमित रूप से बतियाना किसी जटिल संक्रामक रोग से कम नहीं है जो व्यवहार और चिंतन में असाध्य रोग है। परिणामस्वरूप हम कुतर्क पर आधारित टिप्पणियों, तीखे कटाक्ष और प्रजातांत्रिक अलंकारों (♧◇♡♤) के अभ्यस्त हो गये हैं। विचारों के अभाव में यही सुझाया कि चलो आज सभी असहमतियों विवादों से परे कुछ निर्लिप्त लिखा जाये और हम ने झट से फेसबुक पर चेप दिया -#आखिर_मुर्गी_ने_सडक_पार_कर_ली ।मेरी खुशी का कोई ठिकाना न था क्योंकि 15 मिनट में 70 लोगों ने बिना किसी अलंकार के इस असाधारण अभिव्यक्ति को लईक कर लिया। हम कब तक खैर मनाते? तभी एक मोदी भक्त का कमेन्ट आया- आप को मतिभ्रम है यह सड़क विकास पुरूष की देन है। तभी किसी देशद्रोही का कमेन्ट आया- मोदी भक्त यह क्यों नहीं समझते कि मोदी निर्मित सडकों पर केवल मुर्गी ही क्रास कर सकती है। मोदी भक्त ने तत्काल प्रतिक्रिया व्यक्त की- पहले की तुलना में यह मोदी जी की ही देन है कि आज चूहा मुर्गी और गाय माता सुगमता से सड़क पार कर लेती है। व्यस्त सड़कों पर गाय माता बिना किसी वेतन के ट्रेफिक कंट्रोल करती नज़र आती है। मैं ने लिखना चाहा कि मेरी यह पोस्ट मुर्गी के असाधारण साहस बारे है और गैर राजनीतिक है परन्तु तभी मेरी नींद खुल गई और मै स्वप्न लोक से यथार्थ लोक में आ गया।

Monday, 8 October 2018

नमस्ते, मैं गाँधी हूँ ;
जब गांधीजी मूर्ति से प्रकट हुए और आज के नेता से बात चीत की !
गाँधी :नमस्ते, मैं बापू हूँ !मैं यह जानने आया हूँ कि क्या आप लोग मेरा जन्मदिन मेरी विचाधारा के अनुसार एवं अनुरूप मना रहे हैं ?
आज का नेता :कौन बापू  ,किसका बापू ? 
गाँधी :मोहनदास करमचंद गाँधी ,राष्ट्रपिता !
आज का नेता :मोहनदास करमचंद ???वह तो मोहनलाल करमवीर ...नहीं ..मोहनचंद करम दास  ...?
गाँधी :नहीं ,वह मैं नहीं हूँ !
आज का नेता :आप मूर्ति से कैसे प्रकट हुए ?आप तो मूर्ति थे ?
गाँधी :नहीं ,मैं केवल मूर्ति नहीं हूँ , मैं कभी मानव रूप में था और अहिंसा जैसे मानवीय मूल्यों का प्रचारक था !क्या आप निजी और सामाजिक जीवन में अहिंसा पर विश्वास करते हैं ?
आज का नेता :शत प्रतिशत ,बापू !मैं उन सभी के विरुद्ध सशक्त कारवाही करता हूँ जो आप की विचारधारा का विरोध करते हैं !मैं उनकी पिटाई करता हूँ ,उन्हें गिरफ्तार करता हूँ ,उनपर पुलिस की सहायता से लाठीचार्ज तथा आंसूगैस का प्रयोग कराता हूँ !
गाँधी :मेरी दूसरी शिक्षा थी सत्य के लिए संघर्ष करना ,क्या आप सत्य जानने का प्रयास करते हैं ?
आज का नेता :सत्य ? अरे बापूजी ,सत्य के सम्बन्ध मैं आप का पूरा समर्थन करता हूँ ! मैं सत्य के प्रचार प्रसार के लिए सभी माध्यम का प्रयोग करता हूँ ,फेक न्यूज़ ,प्रचार -प्रसार, परिवर्तित [morphed] वीडियो ,फेक फोटो ...मैं सत्य के प्रचार प्रसार के लिए सभी माध्यम का प्रयोग करता हूँ !
गाँधी :सादा जीवन गुजारने बारे आप का क्या विचार है ?मेरी मृत्यु के समय मेरी सम्पति केवल ऐनक ,स्लीपर ,घडी,कुछ बर्तन तथा कुछ अन्य छोटी चीज़ों तक ही सीमित थी !
आज का नेता :बापूजी मैं भी सादा जीवन गुजारने पर विश्वास रखता हूँ !VIP श्रेणी का होने के कारण जब जब मैं यात्रा करता हूँ मुझे एअरपोर्ट पर  किसी प्रकार की सिक्यूरिटी समस्या का सामना नहीं करना पड़ता है ,क्योंकि ब्लैक कमांडो आम आदमी को मेरे पास फटकने नहीं देते ! मेरा जीवन सादगी की मिसाल है !
गाँधी :निराशाजनक भाव !मेरे खादी प्रयोग प्रचार प्रसार बारे आप का क्या विचार है ?क्या आप इसका अनुकरण करते हैं ?
आज का नेता : मैं खादी का पक्का अनुयायी हूँ !विभिन्न रंगों में खादी के बहुत सारे वस्त्र हैं मेरे पास -जैकेट ,शर्ट्स,कुर्ता वह भी विभिन्न स्टाइल और साइज़ में !
गाँधी :टोकते हुए ,रुको रुको ,मेरी जिज्ञासा यह न थी !मैंने गरीबों के लिए अपना जीवन समर्पित किया ! क्या आप ...?
आज का नेता : बापू ,मैं लगातार गरीबों की सेवा कर रहा हूँ और उसी के परिणामस्वरूप गरीब भी अमीर हो रहे और मैं भी अमीर हो रहा हूँ ! मेरा अमीर होना किसी चमत्कार से कम नहीं है !
गाँधी :निराशाजनक स्वर ! मेरा मूर्ती बने रहना ही ठीक है !
आज का नेता :उचित विचार है बापूजी !आप प्रतीकात्मक रूप से मूर्ति में ही बने रहें यही उचित रहेगा !और फिर यदि आप ने ऐसे प्रश्न पुनः पूछने का प्रयास किया तो मैं आप को देशद्रोही अर्बन नक्सलवादी घोषित कर दूंगा !
[टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित ,सारिका घोष के व्यंग्यात्मक आलेख का हिंदी रूपांतरण ]

Saturday, 6 October 2018

हिटलर की परिभाषा लोकतंत्र के सन्दर्भ में  !
हिटलर एक बार अपने साथ संसद में एक मुर्गा लेकर आए और सबके सामने एक-एक करके उसके पंख नोंचने लगे। मुर्गा दर्द से तिलमिलाता रहा। इस पर भी हिटलर ने एक-एक करके उसके सारे पंख नोंच दिये और फिर मुर्गे को फर्श पर फेंक दिया।
तब हिटलर ने अपनी जेब में से कुछ दाने निकालकर मुर्गे की तरफ फेंक दिए और चलने लगा। मुर्गा दाने ख़ाता हुआ हिटलर के पीछे चलने लगा।
हिटलर बराबर दाने फेंकता गया और मुर्गा बराबर दाने मुँह में डालता हुआ उसके पीछे चलता रहा। आख़िरकार वह मुर्गा हिटलर के पैरों में आ खड़ा हुआ।
हिटलर ने स्पीकर की तरफ देखा और एक तारीखी जुमला बोला, `लोकतांत्रिक देशों की जनता इस मुर्गे की तरह होती है। उसके हुकुमत और हुक्मरान जनता का पहले तो सब कुछ लूटकर उसे अपाहिज कर देते है, और बाद में उन्हें थोड़ी सी खुराक दे-देकर उनका मसीहा बन जाते हैं।[मीडिया].

Tuesday, 21 August 2018

गर्व करना हमारा राष्‍ट्रीय अधिकार है,गर्व से हमारा मस्तक हमेशा ऊंचा उठा हुआ होना चाहिये। गर्व करते करते हम कब गर्वोन्नत हो उठेंगे कहा नहीं जा सकता है. जब कोई हाथी गर्वोन्नत हो जाता है तो सभी कुछ तहस नहस करने पर तुल जाता है,एसे हाथी को पागल- हाथी कहा जाता है. बहुतों की गर्दन गर्व से अकड़ जाती है, उस गर्दन को गर्व से अकड़ाये रखने के लिये गर्दन में पट्टा पहनना पड़ता है ,वह पट्टा क्या कहलाता है….आप अच्छे से समझ गये होंगे,स्पॉन्डिलाइटिस का पट्टा ,यह स्पॉन्डिलाइटिस केवल गले में ही होता है ऐसा नहीं है। यह पूरे दिमाग में चढ़ता है, यह पूरी भीड़ पर चढ़ जाता है. भीड़ बेकाबू हो जाती है,किसी को मारती है तो किसी-किसी को तो पीट-पीट कर मार ही डालती है। यह भीड़ यहीं रुक जाती हो ऐसा नहीं है। एक घटना तो अभी-अभी हुई है,बिहार की एक गर्वोन्नत भीड़ ने एक महिला को मात्र शक के आधार पर ही शहर में नग्न कर घुमाया, विडियो भी बनाया और तो और सोशल साइट्स पर अपलोड भी हुआ. यहाँ एक प्रश्न खड़ा होता है ,वे जो यह कर रहे थे वे कौन थे ? वे जो यह देख रहे थे वे कौन थे ? और..और..वे जो सोशल साइट्स पर वीडिओ अपलोड कर रहे थे वे कौन थे ? और इन पर लाइक्स करने वाले ? वे भी तो हैं ? कहना ना होगा , ये सभी गर्दन की अकड़ के मारे हुए हैं अर्थात स्पॉन्डिलाइटिस, स्पॉन्डिलाइटिस का पट्टा बंधे हुए लोग, ये गर्व से तना मस्तक मेरा. इन्हें खुद भी नग्न होना था, ये समाज के, संस्कार के कपड़े भी उतारने थे, फिर यदि ये नग्न स्त्री का नग्न होकर जुलूस निकालते तो समां ही कुछ और होता, वह एक राष्‍ट्रीय शान का विषय बनता, वीडिओ बनता. फिलहाल गधा हंस रहा है, राष्‍ट्रीय कवि स्व. ओम प्रकाश आदित्य ने बहुत ही उम्दा कविता लिखी थी ” इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं, जिधर देखता हूँ ,गधे ही गधे हैं.” और राष्ट्रभक्त गधे ने गर्व करने का एक नया ही आयाम खोज रखा है, वह यह कि ” गर्व से कहो हम गधे हैं.”

Sunday, 19 August 2018

#कुछ_कडवा_कुछ_मीठा 
गाय हमारी माता है, 
मतदान में मत दिलाती है ,
जीत सुनिश्चित कराती है, 
सत्ता तक पहुंचाती है, 
सिंहासन पर बैठाती है,
गाय दुध मलाई देती है,
वोट भी दिलाती है,
चुनाव में जीताती है,
जीवन सफल बनाती है,
हम गाय को गौशाला में छोड़ आते हैं,
माता को ओल्ड एज होम के हवाले कर देते हैं,
जहां वह भूख से तड़प तड़प कर मरती है,
हम गौ रक्षक हैं,
गाय हमारी माता है।

Monday, 13 August 2018

कितने नरेंद्र दाभोलकर? कितने गोविंद पानसरे? लगता है लोगों के हित व हक़ के लिए लड़ने वाली आवाज़ें अब और भी संकट में पड़ने वाली हैं वैसे तो हम इतिहास से सुनते आ ही रहे हैं कि जो आवाज़ें समाज की बेहतरी या उत्पीड़ितों के लिए उठीं उन्हें या तो दुनिया की नज़रों में बुरा साबित किया गया या फिर मौत के हवाले कर दिया गया. अगर हम दूर इतिहास की बात छोड़ दें और हाल के कुछ दशकों को देखें तो भी हम लगभग ऐसे ही उदाहरण पाएँगे. नुक्कड़ नाटक करते सफ़दर हाशमी को सरे आम गोली मारी जाती है और वो भी राजनैतिक गुंडों के द्वारा जिन्हें शह कहाँ से मिली हम सभी जानते हैं. छत्तीसगढ़ में खदान मज़दूरों के लिए आवाज़ बुलंद करने वाले और हाशिए पर पड़े उन लोगों को एकजुट करने वाले शंकर गुहा नियोगी को भी कुछ इसी तरह मुनाफाखोरों के इशारे पर मारा गया. देखें अमन सेठी का यह लेख (http://www.thehindu.com/opinion/op-ed/the-fivelegged-elephant/article2497776.ece). अब की बात करें तो नरेंद्र दाभोलकर और गोविन्द पानसरे के नाम भी उसी श्रेणी में आते हैं. ये बात ज़रूर है कि लोगों के दिलों में आज भी सफ़दर हों या नियोगी, पानसरे या दाभोलकर, उनकी विचारधारा ज़िन्दा है और रहेगी. पर सवाल ये है कि आख़िर जनतंत्र, लोकतंत्र में उठी आवाज़ को दबाने वाली विचारधाराएँ और समूह खुलेआम सर उठाकर कब तक घूमते रहेंगे. गोविन्द पानसरे पर हुए हमले और उनकी मौत ने ये सवाल फिर से खड़ा कर दिया है कि क्या खुलकर अपनी बात अभिव्यक्त करना और सर उठाती कट्टरपंथी ताकतों के खिलाफ बोलना, कमज़ोर तबके के लिए लड़ना या जनता को अन्धविश्वास के खिलाफ एकजुट करना मौत की राह है. ऐसा करने वालों को क्या जान की कीमत ही चुकानी होगी? और वो ताकतें जो इंसान को इंसान से अलग करने में, लूट पर व शोषण पर अपनी सत्ता और शान चलाती हैं वे जीतती रहेंगी. पानसरे की बात करें तो यह वामपंथी नेता सिर्फ राजनैतिक फायदों वाला व्यक्ति नहीं था बल्कि लोगों के लिए और सामाजिक मुद्दों पर खुल कर बोलने वाला एक कार्यकर्ता था. हाल की ख़बरों से मिली जानकारी से हम जानते हैं कि कैसे खुलकर उन्होंने नाथूराम गोडसे को हीरो बनाने को तर्कों से ग़लत साबित किया था. या फिर शिवाजी के बारे में उनके विचार एक राजनैतिक धर्मान्ध या अंधभक्त की तरह साम्प्रदायिकता के चश्मे से ना होकर तर्कों पर आधारित थे जो उन्हें एक सामाजिक नेता के रूप में उभारते थे. पानसरे को धमकियां लगातार मिल रही थीं. उन्हें दूसरा दाभोलकर बनाने को भी कहा गया था  मतलब दाभोलकर की तरह जान से मारने की धमकी. दाभोलकर याने नरेंद्र दाभोलकर जिन्हें क़रीब डेढ़ साल पहले ठीक इसी तरह बाइक सवार हत्यारों ने गोली मार दी थी. दाभोलकर महाराष्ट्र के बड़े रेशनलिस्ट माने जाते थे जो धर्म के नाम पर पाखंडों को और जनता को ठगने वाले बाबाओं के खिलाफ लोगों को सजग करते थे दरअसल दाभोलकर और उनकी संस्था महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति पूरी तरह से तर्कों व वैज्ञानिक सोच पर आधारित है और अंधविश्वास, महिला उत्पीड़न आदि महत्वपूर्ण मुद्दों पर खुलकर काम करती रही है. लीना मैथियस (Lina mathias) के सितम्बर 2013 के economic and political weekly के लेख में उन्होंने लिखा है कि दाभोलकर की संस्था महिलाओं को, मानसिक रोगियों को बाबाओं के चंगुल में जाने से बचाने के साथ ही लगभग हर उस मुद्दे पर काम करती थी जो आम इंसानों के जनजीवन से जुड़ा रहता था या जो राजनैतिक दलों के लिए मशहूर नहीं होता था. चाहे बालिका विवाह की बात हो या देवदासी प्रथा को रोकने की, या छल कपट पर आधारित बाबाओं का पर्दाफाश करने की. ऐसे तमाम मुद्दे थे जिनसे दाभोलकर के कई दुश्मन भी बन गए थे और उनके आयोजनों में हिंसक विरोध व धमिकयां तो मिलना आम हो गया था. आज दाभोलकर की भले ही अज्ञात हत्यारों ने जान ले ली हो पर उनके विचार व संस्था अभी भी जिंदा हैं और रहेंगे. यहाँ दाभोलकर और उनकी संस्था के बारे में देखें http://antisuperstition.org/index.php?option=com_content&view=article&id=139&Itemid=115 गोविन्द पानसरे के विचारों के साथ भी ठीक यही होगा, विचार हमेशा ज़िन्दा रहेंगे. पर अफ़सोस की बात यह है की उस वक्त भी सरकार नाकाम रही और यहाँ भी सरकार नाकाम रही है अब तक. और हो भी क्यों ना, कट्टरपंथी व मानवता विरोधी ताकतों की जगह सरकारें तो सामाजिक कार्यकर्ताओं को अंदर करने व उन पर लगाम कसने को तैयार हैं चाहे तीस्ता सीतलवाड़ हों या ग्रीनपीस संस्था. चाहे कुडनकुलम आन्दोलन के उदय कुमार हों या मेधा पाटकर. उन पर ही तरह तरह के आरोप लग रहे हैं और गुंडे, मुनाफाखोर, साम्प्रदायिक, दबंग लोग नेता या उनके पिछलग्गू बने घूम रहे हैं. ऐसे में समाज के पिछड़े तबकों के लिए आवाज़ बुलंद करने वाले लोगों को चाहे वो आर. टी. आई के एक्टिविस्ट हों या जल जंगल व ज़मीन की लड़ाई के लोग या फिर कट्टरपंथ व धर्मान्ध अंधविश्वास पर बोलने वाले कार्यकर्ता सबकी सुरक्षा पर ऐसे हमले सवालिया निशान लगाते हैं और साथ ही सवाल उठाते हैं कानून व प्रशासन की अकर्मण्यता पर.