Tuesday, 25 July 2017

गरुड़ पुराण :अज्ञान एवं अन्धविश्वास  का महा पुराण  !
अंधविश्वास कैसेकैसे
गरुड़ पुराण में कहा गया है कि पापियों के प्राण गुदा जैसी नीचे की जननेंद्रियों से और पुण्य करने वाले व्यक्तियों के प्राण ऊपर के अंगों से निकलते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि मनुष्य की मौत श्वसन तंत्र फेल हो जाने से ही होती है.
गरुड़ पुराण के प्रथम अध्याय के अनुसार, मृत्यु के बाद मनुष्य का कद एक अंगूठे के आकार जितना रह जाता है और उस को यमलोक की यात्रा करवाने के लिए निकले दूत भयानक होते हैं. पुस्तक के प्रथम अध्याय में कहा गया है कि यमदूत अंगूठे के आकार के मृत व्यक्ति को घसीटते हैं, जहरीले सांपों से डसवाते हैं, तेज कांटों से बेधते हैं, शेर व बाघ जैसे हिंसक जानवरों के सामने आहार के रूप में परोसते हैं. आग में जलाते हैं, कुत्तों से कटवाते व बिच्छुओं से डसवाते हैं.
यहां प्रश्न उठता है कि इतनी यातनाएं देने के बाद भी अंगूठे के आकार का मनुष्य जीवित कैसे रह सकता है? और क्या विशालकाय यमदूतों को अंगूठे के आकार के व्यक्ति को घसीटने की जरूरत पड़ सकती है?
सजाएं यहीं समाप्त नहीं होतीं. इतने छोटे आकार के व्यक्ति को छुरी की धार पर चलाया जाता है. अंधेरे कुओं में फेंका जाता है. जोंकोंभरे कीचड़ में फेंक कर जोंकों से कटवाया जाता है. उसे आग में गिराया जाता है. तपती रेत पर चलाया जाता है. उस पर आग, पत्थरों, हथियारों, गरम पानी व खून की वर्षा भी की जाती है. अंगूठे के आकार के व्यक्ति को वैतरणी नदी जिस का किनारा हड्डियों से जोड़ा गया है व जिस में रक्त, मांस व मवाद का कीचड़ भरा है, में डुबोया जाता है.
उस के बाद यमदूत उसे समयसमय पर भारी मुगदरों से भी पीटते हैं. मृतक की नाक व कानों में छेद कर के उसे घसीटते हैं और शरीर पर लोहे का भार लाद कर भी चलवाते हैं. इस तरह की कई कथित यातनाएं मृतक को दी जाती हैं. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वह मरता नहीं. इस वैज्ञानिक युग में इस तरह की बातें अविश्वसनीय व हास्यास्पद नहीं हैं तो और क्या हैं?
पंडों, पादरियों और मौलवियों, जो अपनेआप को पृथ्वी पर ईश्वर का दूत मानते हैं, ने मृत्यु के बाद का एक काल्पनिक संसार रच दिया है लोगों के दिलोदिमाग में. अपनेआप को शास्त्रों का ज्ञाता बताने वाले इन दूतों ने हरेक कर्मकांड को धर्म से जोड़ कर यजमानों के आसपास ईश्वर के प्रकोप और अनहोनी का जाल बुन दिया है. इस जाल के तानेबाने इतने सशक्त हैं कि धर्मभीरू जनता के लिए इन्हें तोड़ना आसान नहीं. अगर कोई कोशिश भी करना चाहे तो उसे परलोक का भय दिखा कर डराया जाता है. हरेक धर्म के अपने धर्मगुरु होते हैं. समाज का एक बड़ा तबका इन का अनुयायी होता है. इन गुरुओं की रोजीरोटी अपने यजमानों के कारण ही चलती है. जब भी यजमान को कोई परेशानी होती है, वह इन गुरुओं की शरण में आता है और गुरुजी तत्काल उस समस्या का कोई समाधान सुझा देते हैं. बदले में वे मोटी दक्षिणा वसूलते हैं. समस्या जितनी बड़ी होगी, समाधान भी उतना ही महंगा होगा. पिछले दिनों मेरे पड़ोस में रहने वाले एक मित्र का देहांत हो गया. उन का बड़ा बेटा जो कि विदेश में रहता है, अंतिम संस्कार के समय नहीं पहुंच सका. मुखाग्नि छोटे बेटे के हाथों दिलवाई गई. मगर पगड़ी रस्म के समय पंडितजी ने कहा कि बड़े बेटे के रहते छोटे को पगड़ी नहीं पहनाई जाएगी. कुछ अतिरिक्त दक्षिणा ले कर उन्होंने उस का भी तोड़ निकाल दिया. बड़े बेटे की तसवीर को पाटे पर रख कर रस्मपगड़ी संपन्न करवाई गई.

Monday, 24 July 2017

काउंसलिंग के दौरान अक्सर प्रेमिकाएं/पत्नियां एक बात कहती पाई जाती हैं कि ‘उसने मुझे तब छोड़ा जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। मैंने उसे इतना प्यार किया, उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?’ पति या प्रेमी कब भगोड़े नहीं थे? गौतम बुद्ध तब भागे जब उनकी पत्नी यशोधरा नवजात शिशु की मां थी। राम ने सीता का त्याग तब किया जब सीता गर्भवती थी। कुंती ने जब सूर्य से कहा कि ‘आपके प्रेम का प्रताप मेरे गर्भ में पल रहा है’ तो सूर्य बादलों में छुप गए। फिर भी बुद्ध ‘भगवान’ कहलाए और राम ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’। और तो और, कर्ण भी अपने बाप से सवाल पूछने के बजाय कुंती से ही पूछते हैं- ‘आपने मुझे जन्म देते ही गंगा में प्रवाहित कर दिया, फिर कैसी माता?’ यह नहीं सोचा कि अगर उनके महान पिता सूर्य देवता उन्हें अपना नाम देते तो कोई भी कुंती कर्ण को कभी खुद से अलग नहीं करती।

Sunday, 23 July 2017

UNFIT FOR HUMAN CONSUMPTION !
A CAG (Comptroller and Auditor General) report has found the food served by the Railways in trains and at railway stations unsuitable for human consumption. Passengers are forced to buy contaminated and recycled foodstuff at prices higher than those in the open market and often no bills are issued. Packaged and bottled items past their shelf life are available for sale as also unauthorized brands of water bottles, indicating poor monitoring. CAG and railway teams have come out with these findings after conducting a joint inspection at 74 railway stations and on 80 trains. Besides, the report has found lack of cleanliness at the catering units at stations and on trains. For frequent travellers this may not be a surprise. 
संस्कारी पहलाज निहलानी की कैंची पर रोकथाम ज़रूरी  !
हमारे देश में वैचारिक मतभेद पर अभिव्यक्ति बोद्धिक वाद विवाद का अभिन्न अंग रहा   है परंतु आज के परिवेश में संघ परिवार इस परंपरा को देशद्रोह मानता है .फिर भला "हर हर मोदी घर घर मोदी "के रचनाकार संस्कारी समर्पित आज्ञाकारी निहलानी देश भक्ति की दौड़ में पीछे कैसे रह सकते हैं ? फिल्म प्रमाणिकता के केन्द्रीय बोर्ड [CBFC] के बॉस का पद यूं ही तो नहीं मिला है .उनका दायित्व बनता है कि फिल्मों को अधिकृत प्रमाण पत्र केवल और केवल नागपुरी संस्कार सभ्यता तथा आचार संहिता की स्थापित नियमावली के अनुसार ही इशू किया जाये .
फिल्म लिपिस्टिक अंडर माय बुरका को भले ही विश्व स्तर पर सरहाने के साथ साथ प्रशंसा मिली हो परंतु बॉस की आज्ञा अनुसार फिल्म का प्रदर्शन भारत की पावन भूमि में नहीं हो सकता क्योंकि फिल्म बोल्ड है निर्माण अभिनय और विषय सब कुछ नारी प्रधान है. जाने माने अर्थ शास्त्री और फिल्म निर्माता सुमन घोष की नोबेल पुरस्कार विजेता अमरत्य सेन पर बनी डाक्यूमेंट्री निहलानी की कैंची का शिकार बनी है. मुख्य आधार विचारधारा का है. सेन अपनी विशिष्ट आर्थिक विचाधारा के कारण देश द्रोहिओं की अवांछित श्रेणी की लिस्ट में लिपिबद्ध हैं . भक्तों ने सेन से नोबल पुरस्कार छीनने की मांग भी की थी . बस फिर क्या था ,भगवा फरमान जारी हो गया कि फिल्म से वह सभी संदर्भ काट दिए जायें जहाँ जहाँ डाक्यूमेंट्री में देशद्रोही शब्दों  'गुजरात' 'हिन्दू इंडिया' 'cow' तथा 'Hindutva view of India [भारत का हिन्दुत्ववादी द्रष्टिकोण]' का प्रयोग किया गया है. 
आज के परिवेश में चर्चा और चिंतन का विषय है कि क्या धर्मनिरपेक्ष प्रजातन्त्रवादी वयस्था में एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति पर अपनी विचाधारा थोपने का संविधानिक अधिकार है ? देश तथा समाज के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित है ? एक विशेष धर्म प्रेरित रजनीतिक विचारधारा और उसके अनुरूप आचार संहिता का औचित्य कहाँ और क्योंकर बनता है ? संविधान में परिभाषित मूल अधिकारों की प्रासंगिकता क्या संघ परिवार के राजनीतिक सशक्तिकरण के साथ साथ ही निरस्त हो गई है ? माना आरएसएस राज्य में व्यवहार और चिंतन में हिंदूवादी विचारधारा का बोलबाला है जिसके अंतर्गत धर्म निरपेक्ष प्रजातान्त्रिक व्यवहार और चिंतन देशद्रोह की परिभाषा में परिभाषित है लेकिन अभीतक संघ परिवार के न चाहते भी  संविधान के आधार पर भारत देश  धर्म निरपेक्ष  प्रजातान्त्रिक देश है न कि संस्कारी हिन्दू राष्ट्र !

Saturday, 22 July 2017

FUTILITY OF RECITING VERSES FROM HINDU SCRIPTURES AT THE TIME OF DEATH ;
Since time immemorial,there is sanctimonious sanctity for reciting verses from Guradhpuran/Vedas/ Geeta with the help of Brahmnical professional expertise,at the time of death .Credulous and gullible have got profound faith that recitation of verses ,not only absolves deceased from all committed sin and immorality,but also is instrumental in preserving place of comfort in 'next/other world'.Social hype is given to the fact that 'sacred mantras' were chanted when he/she was cremated.This chanting is meaningless as the dead cannot hear nor is it established any way that content and context of verses is communicated to supposed gods,in the larger interests of deceased.The recited verses are Greek for mourners too,as they can hardly understand ,whatsoever is being recited in chaste Sanskrit language.Can the chanting change and alter the alleged much publicized karma hypothesis ?Can the chanting orchestrate post death deputation process for heaven and hell ?Can the attribution of moral turpitude and moral rectitude be interchanged and modified as per whims of the kith and kin of deceased ?Now hypothetically speaking,in case of such eventuality ,the whole edifice of Hinduism will crumble and falsification of karma theory will be accordingly established.The fact of the matter is that,said post death ritual is not only futile exercise but meaningless gesture too,though it is 'meaningful and purposeful' for that class of social parasites,popularly known as Brahmans.
KARMA YOGA; कर्म योग !
IS IT FEASIBLE OR REASONABLE TO WORK WITHOUT SOME MOTIVATING DESIRE ? 
Karmanyevaadhikaaraste maa phaleshu kadaachana;
Maa karmaphalahetur bhoor maa te sango’stwakarmani.[Geeta].
. Thy right is to work only, but never with its fruits; let not the fruits of actions be thy motive, nor let thy attachment be to inaction.
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतूर्भूर्माते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।[गीता].
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उनके फलों में कभी नहीं | इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो |[
The teaching of karmyoga consists of two parts:first you have to do your work without an eye or desire for the fruit thereof and secondly,the fruit of your action,if and when obtained,is to be discarded or surrendered or thrown away.In no case should it be accepted.You have to renounce it.To ordinary person like me,this appears a strange,startling and un-intelligible doctrine.Followers are told that it is their obligation [right to work] but to the fruit thereof,they never have a right.I think that a man's right to the fruit of his labor is fundamental and unquestionable.A desire to achieve certain results is the mother of progress.progress. Desirelessness is the mother of stagnation.In the absence of desire,we would still have been jumping from tree to tree without shedding our tails and still walking on all fours.
Again what does renunciation of the fruits of action mean?What is the process by which followers have to surrender the fruits of action to 'god'?Are they supposed to keep the pay packet or the currency notes on the alter of a temple or at the feet of an idol and think no more about it?
All inventors,research workers,explorers work with motive or objective and are interested in the results.Nothing was ever achieved by object less endeavor.