Thursday, 7 January 2016

Homeopathy is bogus, harmful: Nobel laureate Venkatraman Ramakrishna

  • Bhartesh Singh Thakur, Hindustan Times, Chandigarh
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  • Updated: Jan 06, 2016 10:22 IST

India-born Nobel laureate Venkatraman Ramakrishnan has refused to attend the Indian Science Congress ever in future (royalsociety.org)


Calling homeopathy and astrology useless and harmful practices, Nobel laureate Venkatraman Ramakrishnan came down heavily on the two, saying real science is far more interesting than “bogus” fields.
Pointing out that India is the only country where a constitution asks for promoting scientific temper, the chemistry scientist said India needs a more rational outlook on such practices.
Explaining that astrology evolved from the human tendency to look for “patterns, generalise and believe”, Ramakrishnan said, “There is no scientific basis for how movement of planets and stars can influence our fate. There is no reason for time of birth to influence events years later. The predictions made are either obvious or shown to be random.”
“Once beliefs take root, they are hard to eradicate,” he commented, adding, “A culture based on superstitions will do worse than one based on scientific knowledge and rational thoughts.”
Contrary to the general notion that homeopathy originated in India, the scientist also clarified that it was a practice started by a German.
“They (homoeopaths) take arsenic compounds and dilute it to such an extent that just a molecule is left. It will not make any effect on you. Your tap water has more arsenic. No one in chemistry believes in homoeopathy. It works because of placebo effect.”
Ramakrishna was however appreciative of modern day astrology considering the more specific scientific advancements made.
“Alchemy is based on beliefs but accumulated huge amount of data about properties of substances and led to modern chemistry. Astrology was struck in past but modern astronomy has made huge exciting discoveries like the black hole, pulsars etc.”
The onus ultimately lies on humans, for science to be accurate. “Scientists are humans. We have egos, superstitions etc. What is required is to test our ideas by experiments which protect us from false beliefs.”
To elaborate, he cited the cold fusion theory. Initially claimed by Martin Fleischmann and Stanley Pons, the much-hyped theory was later proved to be unfounded. “In 2011, it was claimed from CERN experiments that neutrinos travel faster than light. Later, it came out that it was a measurement error,” Ramakrishnan said and added that sometimes scientists propose ideas well outside their area of expertise and make mistakes.
So did planes really exist in ancient India, as claimed at the Indian Science Congress in Mumbai last year?
“It was surprising for me that Indian science academies did not condemn it. Science has to be based on data. You have to show that you did it and others should be able to verify it. It is impossible that India had plane technology 2000 years ago.”
Science in India has nevertheless become more exact over time. “In the last century alone, life expectancy has doubled. It is because medicine has become scientific and evidence based. There is better understanding of physiology and biochemistry and many diseases have been eradicated.”
Ramakrishnan, who was awarded the Nobel Prize in chemistry in 2009, was speaking at the Panjab University at Chandigarh to deliver the Har Gobind Khorana lecture on ‘On Nobody’s Word: Evidence and Modern Science’.

Tuesday, 5 January 2016

कर्मचारी नेता ने सुनाया एेसा सपना कि लोग गुस्से से बेकाबू हो गए, जमकर की पिटाई !


भोपाल। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशाें से भी ज्यादा की मांग कर रहे कर्मचारी संगठनों की सभा में एक कर्मचारी नेता की उस समय जमकर पिटाई हो गई, जब उसने रात को उसे आया सपना भरी सभा में सुना दिया। उसे तमाम सरकारी कर्मचारियों ने न केवल पिटा बल्कि कर्मचारी समाज के लिए कलंक करार देते हुए सभा से निष्कासित भी कर दिया।
दरअसल, आज सुबह संयुक्त कर्मचारी संगठनों की जैसे ही सभा शुरू हुई, कर्मचारी नेता रघुवीर रामदुहाई ने गलती से सातवें वेतनमान को लेकर एक रात पहले उसे आए अपने सपने का जिक्र छेड़ दिया। सभी उससे अपना सपना सुनाने की मांग करने लगे। उसने लाख मना किया, लेकिन लोग नहीं माने।
तब उसने अपना सपना इस तरह से सुनाया- “मित्रो, कल की रात मैंने एक सपना देखा। शुरुआत अच्छी हुई। सरकार ने हमें सातवें वेतनमान से भी बढ़कर वेतन दिया है।” उपस्थित लोगों ने तालियां बजाई।
फिर वह आगे बोला, “लेकिन इसके बाद का दृश्य बहुत ही भयावह था। मैंने देखा कि हम सब कर्मचारी नया वेतन मिलने के बाद टाइम पर ऑफिस पहुंचने लगे हैं। अब हम नौकरी नहीं, काम कर रहे हैं। हममें से कोई भी शाम के साढ़े पांच बजे का इंतजार नहीं कर रहा है। काम पूरा होने के बाद ही ऑफिस से उठ रहा है, भले ही रात के आठ ही क्यों न बज जाए। अब किसी को छुटि्टयों की चिंता नहीं है। हम सबको केवल आम जनता के लिए काम करने की चिंता है। हम सब कर्मचारी आपस में चर्चा करते रहते हैं कि सरकार ने हमें अपने काम से ज्यादा पैसा दिया है। इसलिए अपना काम करना हमारा परम दायित्व है।”
सपने को सुनते ही सभा में बैठे लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंचने लगा। कई लोग मंच पर पहुंचकर रामदुहाई के साथ झूमाझटकी करने लगे। लेकिन रामदुहाई ने कहा कि सपने की सबसे खतरनाक बात तो मैंने सुनाई ही नहीं। वह यह कि हम सबने रिश्वत लेना भी छोड़ दिया। रामदुहाई के इतना कहते ही सब लोग उस पर टूट पड़े। उसे मार-मारकर सभा से बाहर निकाल दिया गया।
बाद में सभा की अध्यक्षता कर रहे कर्मचारी नेता ने रामदुहाई की कही गई सारी बातों को ‘null and void’ घोषित करते हुए सभा की कार्यवाही से विलोपित करवा दिया। सभा ने इस पर आश्चर्य जताया कि एक सरकारी कर्मचारी को आखिर इतना खराब स्वप्न आ भी कैसे सकता है।
 रामदुहाई ने भी इस बात पर अफसोस जताया कि एक कर्मचारी होने के बावजूद उसे ऐसा दु:स्वप्न नहीं देखना चाहिए था। उसने कहा- “हे भगवान, ऐसा सपना दिखाने से पहले मुझे रिश्वत लेने के आरोप में तुने सस्पेंड क्यों नहीं करवा दिया।”
दो मुख्य मंत्री -मानिक सरकार और केजरीवाल !तुलनात्मक अध्ययन. 
मुझे विश्वास है बहुत सारे लोगों ने वर्ष 2013 में चौथी बार त्रिपुरा राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में निर्वाचित, मानिक सरकार का नाम शायद ही सुना होगा जबकि वर्ष 2014 में पहली /दूसरी बार दिल्ली राज्य के निर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में केजरीवाल अच्छे /बुरे कारणों तथा "विशिष्ट राजनीति " के चलते बहुचर्चित रहे हैं. दोनों की राजनीतिक सोच में ज़मीन आसमान का अंतर है. जहाँ मानिक सरकार अतिशयोक्तिपूर्ण प्रचार और दिखावे से दूर सरल, कर्मठ, निष्ठावान,समर्पित मार्क्सवादी हैं वहीं दूसरी ओर केजरीवाल वाम-मध्य -दक्षिण और कहीं अतिवादी राजनीतिक व्यवहार का मिला जुला अलबेला मिश्रण है. जहाँ मानिक सौम्यऔर विनम्र प्रकृति वाले व्यक्ति है, केजरीवाल आक्रमक तेज़तरार व्यक्ति है.
मानिक सरकार के पास न तो खुद का मकान है और न ही अपनी कार. वह नियमित रूप से साईकिल या पैदल अपने कार्यालय जाते हैं. मुख्यमंत्री के रूप में सरकारी नियमाधीन जो वेतन आदि मिलता है वह समस्त राशि अपनी पार्टी मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट दल को देते हैं और पार्टी की ओर से उन्हें अपने तथा परिवार के लिए प्रतिमाह 5000 रूपये मिलते है. उन के कट्टर विरोधी भी मानते हैं कि वह स्वयं तो बेदाग़ हैं ही, वरन तुलनात्मक रूप से उन का मंत्रीमंड़ल भी बेदाग़ है. उन का आजतक केन्द्रीय राजसत्ता से कोई विशेष टकराव नहीं रहा है और दक्षिणपंथी भाजपा सरकार के साथ उन के सम्बन्ध सकारात्मक और रचनात्मक हैं.
केजरीवाल की अपनी चुनावी घोषणा के अनुसार दिल्ली में उन के पास दो मकान हैं. वह बड़े सरकारी मकान में पूरे तामझाम के साथ रहते हैं. यह सर्व विदित और चर्चा का विषय रहा है कि किस प्रकार उन्होंने चुनाव फंड़ के लिए "गुमनाम " व्यक्ति /व्यक्तियों से पचास पचास लाख के चार चेक बड़े आराम से स्वीकार किए. चुनावी रैलियों में वह कहा करते थे कि वह मुख्यमंत्री के रूप में अपना वेतन दान करेंगे पर ठीक इस के विपरीत, मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने, पूरे देश में एक नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए अपने और अपने साथी विधानसभा सदस्यों के वेतन में असाधारण रूप से 400 प्रतिशत की वृद्धि करादी, जिस के परिणामस्वरूप "आम आदमी "के संवैधानिक प्रतिनिधि प्रतिमाह दो दो लाख से अधिक धनराशि प्राप्त कर रहे हैं. वह संविधानिक या अन्य किसी स्थापित मर्यादा को न्यूनतम प्रासंगिक मानते है. मानते हैं कि उन का दृष्टिकोण सदा गल्त नहीं हो सकता परन्तु उन का दृष्टिकोण सदा तर्कसंगत नहीं हो सकता. और न ही केजरीवाल श्रीमान परफेक्ट हो सकते हैं. कई बार लगता है कि वह अभीतक विरोधी राजनीति की छत्रछाया में ही जी रहे हैं.

Sunday, 3 January 2016

जाने-माने ज्योतिषाचार्य जानदार विस्कीवाला ने नए साल के लिए की ये भविष्यवाणियां…



1. अच्छे दिन आएंगे, मोदी के सारे विदेश दौरे निरस्त होंगे :

गणेशजी की कृपा से एक जनवरी 2016 से देश में वाकई अच्छे दिनों की शुरुआत हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल होने वाले सारे 134 विदेश दौरे निरस्त कर दिए हैं। वे अब केवल देश की समस्याओं पर ही ध्यान देंगे। विदेश दौरों पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ही जाया करेंगी।

2. राहुल बनेंगे समझदार, चुटकुलों के लिए तरसेंगे लोग :

बुद्धि के देवता हैं गणेशजी। गणेशजी की कृपा से राहुल इतने समझदार बन जाएंगे कि लोग चुटकुलों के लिए तरस जाएंगे। सोशल मीडिया भी एक बयान जारी कर राहुल पर बनाए गए चुटकुलों के लिए माफी मांग लेगा। कुछ कांग्रेसी राहुल-सोनिया की चमचागिरी करने से इनकार भी कर देंगे।

3. बॉलीवुड के दिन फिरेंगे, ‘आप’ का मनाेरंजन खत्म होगा:

पिछले कुछ दिनों से देश में मनोरंजन जगत की कमान आम आदमी पार्टी (आप) ने संभाल रखी है। लेकिन नए साल में ‘आप’ पूरा ध्यान काम पर लगाएगी। इससे बॉलीवुड में आया संकट खत्म होगा। सीरियल्स की टीआरपी में भी फिर से सुधार होगा।

और अंतिम, ये सारी भविष्यवाणियां सच होंगी :

विस्कीवाला ने बताया कि उन्हाेंने जो भविष्यवाणियां की है, ये वाकई काफी अध्ययन और मनन के साथ की है। गणेशजी की कृपा से ये सारी उसी तरह सच होंगी, जिस तरह अभी तक सारे ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां सच होती आई हैं। लोग इस पर उसी तरह से विश्वास कर सकते हैं, जैसे कि सारे ज्याेतिषियों की भविष्यवाणियों पर करते आए हैं।
कामरेड वर्धन का निधन;
जब पंजाब में शुरू हुए आतंकवाद के काले दौर के दौरान 25000 लोग मारे गए जिनमें आमजन के अलावा कम्युनिस्ट, कांग्रेस, भाजपा व अकाली सभी राजनीतिक दलों के नेता सर्वश्री दर्शन सिंह कैनेडियन, दीपक धवन, सुखदेव सिंह उमरानंगल, संत लौंगोवाल, जोगेंद्र पाल पांडे व हिताभिलाषी आदि शामिल थे। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह भी आतंकवादियों के हाथों ही शहीद किए गए।
उस काले दौर में जब संत-महात्मा व बड़े राजनीतिक दलों के नेता पंजाब आने से डरते थे, आतंकवाद ग्रस्त इलाकों का दौरा करने में ज्योति बसु, सोमनाथ चटर्जी, ए.बी. बर्धन तथा गुरुदास दासगुप्त जैसे नेता अग्रणी थे जिनका पंजाब में आतंकवाद के विरुद्ध लडऩे में महत्वपूर्ण योगदान रहा।
इन्होंने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए पंजाब में कई रैलियां कीं और विशेष रूप से आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित माझा इलाके के गांवों और अमृतसर तथा तरनतारन आदि के दौरे करके लोगों का मनोबल बढ़ाया।
इसीलिए सभी विचारधाराओं के नेताओं ने उनकी मृत्यु पर दुख व्यक्त किया है। नि:संदेह श्री बर्धन हमेशा एक जुझारू नेता के रूप में याद किए जाएंगे जो जीवन भर वंचित और हाशिए पर पड़े लोगों के लिए लड़ते रहे: फैज़ अहमद फैज़ के शब्दों में उनको श्रदांजलि :-
‘जो बादा कश थे पुराने वो उठते जाते हैं,
कहीं से आबे बका-ए-दवाम ला साकी।

Saturday, 2 January 2016

नए साल की नई उम्मीद, नेताओं के अल्जाइमर का होगा इलाज  !

बेंगलुरु। नया साल एक नई उम्मीद लेकर आया है। इंडियन पोलिटिकल साइकोलॉजी में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार भारतीय नेताओं के अल्जाइमर का जल्दी ही इलाज संभव हो सकेगा। गौरतलब है कि सत्ता में आने पर वादों को भूल जाना नेताओं की आम बीमारी रही है।
शोध पत्र के सहलेखक डॉ प्रवीण मुनोरिया के अनुसार अल्जाइमर में व्यक्ति को भूलने की बीमारी (memory loss) हो जाती है। इसका कोई इलाज नहीं है, खासकर सत्ता में आते ही नेता इस बीमारी से ग्रस्त हो जाता है। लेकिन डॉ मुनोरिया के नेतृत्व में बेंगलुरु स्थित निम्हान्स रिसर्च सेंटर में कुछ चूहों पर सफल परीक्षण किया गया है। इन चूहों पर public pressure नामक दवा का प्रयोग किया गया। इस प्रयोग में दवा देने से पहले चूहों को एक कुर्सी पर चढ़ाया गया। कुर्सी पर चढ़ते ही चूहे वे सब कुछ भूल चुके थे, जो उन्हें पहले याद था। लेकिन इस दवा का डोज देने के बाद जब चूहों को दोबारा कुर्सी पर चढ़ाया गया तो उन्हें धीरे-धीरे कुछ बातें याद आने लगीं।
डॉ मुनोरिया के अनुसार सबसे बड़ी चुनौती public pressure को विकसित करना होगा। चूहों में तो यह परीक्षण कर लिया गया, लेकिन भारतीय जनता के बीच public pressure बनाना काफी मुश्किल काम है। जिस दिन यह बन जाएगा, उस दिन से नेताओं के अल्जाइमर का इलाज आसानी से हो जाएगा।
कार्पोरेट नियन्त्रित निजी चैनलों द्वारा टी आर पी वृद्धि हेतु अंधविश्वास का प्रचार प्रसार !
टीवी चैनलों से आजकल धर्मांध दर्शकों के आगे जो अंधविश्वास परोसा जा रहा है, वह गहन चिंतन और चिंता का विषय है. अंधविश्वासों की परम्परा प्राचीन है, परन्तु आज 21वीं शताब्दी में टीवी चैनल अपने निज स्वार्थ पूर्ति के लिए अंधविश्वास के अंधकार को और गहरा कर रहे हैं जिस के परिणामस्वरूप अकर्मन्यता और अवैज्ञानिकता को बढावा मिल रहा है. चूंकि कार्पोरेट जगत का राजनीतिक दलों से गठजोड़ है और फिर आज के संदर्भ में भजनमण्ड़ली सरकार से किसी सकारात्मक पहल की आशा रखना बेकार है.
अंधविश्वासों के फैलाव की जैसे बाढ सी आगई है. पहले यह धन्धा केवल कर्मकांडों तक सीमित था, परन्तु आज अंधविश्वास एक बहुत बढ़ा कारोबार बन गया है. चैनलों पर तथाकथित बाबे, साधु साधवियां, गुरू महात्मा, तांत्रिक, ज्योतिषी, पुजारी, आचार्य आदि, पैसे के बलबोते चैनलों का प्राइम समय खरीद कर, धर्मांध भक्तों को यह दुनिया और दूसरी कपोलकल्पित दुनिया संवारने का सपना बेच कर अरबों खरबों के मालिक बन बैठे हैं
समाज में अंधविश्वास फैलाने और किसी भी नागरिक की चमत्कारी ढंग से समस्या सुलझाने का दावा करना Magical remedies and objectionable advertisement act की विभिन्न धाराओं का खुला उल्लंघन है. अन्य सम्बन्धित कानूनों की खुले आम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, परन्तु संज्ञान लेने की किसी पड़ी है, वह भी भजनमण्ड़ली सरकार के छत्रछाया में?